Mahashivratri Vrat Katha 2026 In Hindi: महाशिवरात्रि व्रत कथा, शुभ मुहूर्त | यहाँ पढ़ें शिकारी भील की पूरी कहानी

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हर हर महादेव 🙏,
आज हम आपके लिए एक खास और पावन कथा लेकर आए हैं, जो साल के सबसे महत्वपूर्ण और शक्तिशाली पर्वों में से एक महाशिवरात्रि से जुड़ी हुई है। Mahashivratri Vrat Katha 2026 In Hindi के अंतर्गत हम महाशिवरात्रि व्रत की एक छोटी लेकिन अत्यंत प्रेरणादायक कथा साझा करेंगे, जिसे पढ़ने से मन को शांति मिलती है और शिवरात्रि व्रत को सफलतापूर्वक करने की प्रेरणा मिलती है।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, महाशिवरात्रि के शुभ अवसर पर ही भगवान शिव और माता पार्वती का दिव्य विवाह संपन्न हुआ था, जो प्रेम, भक्ति और आध्यात्मिक एकता का प्रतीक है। मान्यता है कि इस कथा को पढ़े बिना महाशिवरात्रि का व्रत अधूरा माना जाता है। यहाँ आप उस प्रसिद्ध शिकारी की प्रेरणादायक कथा पढ़ेंगे, जिसने अनजाने में ही भगवान शिव की कृपा प्राप्त कर ली थी। तो आइए दोस्तों, भगवान शिव की भक्ति में लीन होकर इस पावन और चमत्कारिक कथा की यात्रा आरंभ करते हैं।

Mahashivratri Vrat Katha 2026 In Hindi

महाशिवरात्रि 2026 कब है? (Maha Shivratri 2026 Date)

महाशिवरात्रि 2026 का पावन पर्व इस साल 15 फरवरी 2026, दिन रविवार को मनाया जाएगा। हिन्दू पंचांग के अनुसार, फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि का प्रारंभ 15 फरवरी 2026 को शाम 05:04 बजे से होगा और इसका समापन अगले दिन 16 फरवरी 2026, सोमवार को शाम 05:34 बजे तक रहेगा। चूंकि भगवान शिव की मुख्य पूजा रात में की जाती है, इसलिए निशिता काल के अनुसार महाशिवरात्रि 15 फरवरी को ही मनाई जाएगी।

महाशिवरात्रि 2026 पूजा का शुभ मुहूर्त और समय:
महाशिवरात्रि की मुख्य पूजा का सबसे श्रेष्ठ समय (निशिता काल मुहूर्त) 16 फरवरी 2026 दिन सोमवार की मध्यरात्रि (Late night) को रात 12:09 बजे से रात 01:01 बजे तक रहेगा। इस विशेष पूजा के लिए कुल शुभ अवधि 51 मिनट की होगी।

महाशिवरात्रि 2026 व्रत पारण का समय
जो श्रद्धालु महाशिवरात्रि का व्रत रखेंगे, वे अगले दिन यानी 16 फरवरी 2026, सोमवार को अपना व्रत खोल सकते हैं। व्रत पारण (Parana) का शुभ समय सुबह 06:59 बजे से दोपहर 03:34 बजे तक रहेगा।

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महाशिवरात्रि व्रत की पौराणिक कथा (Mahashivratri Vrat Katha 2026 In Hindi)

(कथा आरंभ)

शिकारी गुरुद्रुह की भोजन की तलाश और अनजाने में शिव भक्ति:
प्राचीन काल में एक जंगल में गुरु दुह नाम का एक भील रहता था, जो बहुत शक्तिशाली और क्रूर स्वभाव का था। वह पशुओं को मारकर अपना और अपने परिवार का भरण-पोषण करता था। उसने कभी भी कोई धार्मिक कार्य नहीं किया था।

जब कई दिनों तक उसे उत्तम भोजन नहीं मिला, तो वह जंगल में भटकते-भटकते बहुत दूर निकल गया और काफी देर तक कोई शिकार न मिलने पर वह थक-हारकर एक बेलपत्र के पेड़ पर चढ़कर बैठ गया, जो एक तालाब के पास स्थित था।

उसने सोचा कि जब कोई पशु यहाँ पानी पीने आएगा, तो वह उसका शिकार कर लेगा। लेकिन उसे यह पता नहीं था कि उसी पेड़ के नीचे एक शिवलिंग स्थापित था, जो बेलपत्रों से ढका था।

महाशिवरात्रि की पहले पहर की पूजा:
रात के पहले पहर में जब एक प्यासी हिरणी तालाब पर पानी पीने आई, तो शिकारी ने उस पर बाण साध लिया। तभी हवा के झोंके से बेलपत्र नीचे गिरकर जल सहित शिवलिंग पर आ गिरे, और अनजाने में प्रथम पहर की पूजा संपन्न हो गई।

अपनी मृत्यु को सामने देखकर हिरणी ने शिकारी से करुण स्वर में पूछा “तुम मुझे क्यों मारना चाहते हो?” इस पर शिकारी बोला “मैं और मेरा परिवार सुबह से भूखे हैं, इसलिए मुझे शिकार करना पड़ रहा है।” यह सुनकर हिरणी भावुक होकर बोली “हे शिकारी, कृपया मुझे अभी मत मारिए।

मेरे दो छोटे बच्चे हैं। मैं वचन देती हूँ कि मैं उन्हें अपनी बहन के पास सुरक्षित छोड़कर लौट आऊँगी। उसके बाद आप मेरा शिकार कर लिजिएगा” पहले प्रहर की पूजा के प्रभाव से उसके कुछ पाप तुरंत नष्ट हो गए और उसके मन में करुणा व दया की भावना उत्पन्न होने लगी।

महाशिवरात्रि की दूसरे पहर की पूजा:
भगवान शिव की कृपा से शिकारी का कठोर मन करुणा से भर उठा और शिकारी ने उसे जाने दिया। कुछ समय बाद वहाँ दूसरी हिरणी आई। और शिकारी ने फिर धनुष उठाया।

उसने भी शिकारी से विनती करते हुए कहा, “मेरे घर में दो छोटे बच्चे हैं कृपा मुझे उन्हें सुरक्षित स्थान पर छोड़कर आने दीजिए। मैं अवश्य लौटूँगी।” शिकारी का हृदय थोड़ा पिघल गया और उसने उसे भी जाने दिया। इस प्रकार दूसरे प्रहर की पूजा पूर्ण हो गई।

महाशिवरात्रि की तीसरे पहर की पूजा:
फिर रात के तीसरे पहर एक हिरण (नर हिरण) वहाँ आया। शिकारी ने उसे भी पकड़ने का प्रयास किया। पहले के सभी की तरह “हिरन” ने भी उसे मारने का कारण पूछा तो शिकारी ने अपने परिवार को भूखा होने की बात बताई।

मृत्यु को सामने देखकर हिरण ने शांत और विनम्र स्वर (Polite tone) में कहा “हे शिकारी, मेरे घर में छोटे-छोटे बच्चे हैं और उनकी माता मेरी राह देख रही है। यदि मैं आज नहीं लौटा, तो वे बेसहारा हो जाएंगे। कृपया मुझे अभी मत मारिए। मैं उन्हें सुरक्षित देखकर अवश्य लौट आऊँगा।

“हिरण की करुण पुकार और वचनबद्धता से शिकारी का मन द्रवित हो गया। उसने दया दिखाते हुए उसे भी छोड़ दिया। इस प्रकार अनजाने में महाशिवरात्रि के तीसरे पहर की पूजा भी पूर्ण हो गई और शिकारी के हृदय में करुणा और भक्ति की भावना और अधिक प्रबल हो गई।

महाशिवरात्रि की चौथे पहर की पूजा:
कुछ ही देर में वे तीनों अपने दिए हुए वचन के अनुसार वापस लौट आए। वे आपस में विचार करने लगे कि कौन पहले बलिदान देगा, ताकि बाकी का परिवार सुरक्षित रह सके।

नर हिरण ने कहा “मैं शक्तिशाली और स्वस्थ हूँ, यदि मैं जाऊँगा तो शिकारी के परिवार का पेट भर जायेगा, लेकिन पहली हिरणी ने दृढ़ स्वर में कहा “मैंने सबसे पहले वचन दिया था, इसलिए मेरा कर्तव्य है कि मैं अपने वचन का सबसे पहले पालन करू”

दूसरी हिरणी भी पीछे नहीं हटी और बोली “मैं भी अपना वचन नहीं तोड़ सकती। सत्य और वचन ही जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।” उन तीनों की सत्यनिष्ठा (integrity), त्याग (Sacrifice) और वचन पालन (promise keeping) देखकर उनके छोटे-छोटे बच्चे भी पीछे-पीछे वहाँ आ गए।

यह दृश्य इतना करुणामय था कि शिकारी का हृदय द्रवित हो गया। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे और उसके हाथ काँपने लगे। उसे पहली बार अपने कर्मों पर ग्लानि हुई और खुद से घृणा हो रही थी कि मैं मनुष्य होकर कितना गलत कार्य कर रहा हूँ और ये जानवर होते हुए भी अपने वचन को पूरा करने के लिए अपने प्राण त्यागने को तैयार है। शिकारी ने उन सभी को छोड़ने का मन बना लिया। इसी के साथ चौथे पहर की पूजा भी पूर्ण हुई।

महादेव का दिव्य दर्शन और शिकारी का उद्धार:
उसी क्षण आकाश दिव्य प्रकाश (divine light) से भर उठा और भगवान शिव प्रकट हुए। शिवजी ने कहा “हे शिकारी, तुमने अनजाने में ही महाशिवरात्रि के चारों पहरों की पूजा पूर्ण कर ली है। दया, सत्य, करुणा और वचन पालन से तुमने मुझे प्रसन्न कर दिया है।”

भगवान शिव ने हिरणों और उनके परिवार को जीवनदान दिया और शिकारी को समृद्धि, पुण्य, कुल-वृद्धि और सद्बुद्धि का वरदान प्रदान किया। और उस दिन के बाद शिकारी ने हिंसा का मार्ग छोड़कर धर्म, सेवा और शिव भक्ति का पथ अपना लिया और जब उसका अंत समय आया तो शिव के गण उसे अपने साथ ले गए और उसे शिवलोक में स्थान प्राप्त हुआ.

( व्रत कथा समाप्त )

कथा का सार

दोस्तों, महाशिवरात्रि की यह कथा हमें सिखाती है कि भगवान भोलेनाथ केवल सच्चे भाव के इच्छुक हैं। यदि कोई अनजाने में भी पूरी श्रद्धा या करुणा के साथ शिव का स्मरण करता है, तो महादेव उसके समस्त पापों को क्षमा कर अपनी कृपा बरसाते हैं। अनजाने में ही सही, लेकिन जब उस शिकारी के मन में हिरणों के प्रति दया (Compassion) जागी और जब उन हिरणों ने अपने सत्य (Truth) और वचन का पालन किया, तो स्वयं भगवान को धरती पर आना पड़ा।

जब मनुष्य अपने अहंकार, क्रूरता और स्वार्थ को त्याग देता है, तब उसका जीवन सच्चे अर्थों में पवित्र और सफल बनता है। आइए, इस महाशिवरात्रि पर हम सभी यह संकल्प लें कि हम न केवल भगवान शिव की पूजा करेंगे, साथ ही उनके आदर्शों को अपने जीवन में भी उतारेंगे। यही इस पावन पर्व का सच्चा उद्देश्य और सबसे बड़ा संदेश है।

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अस्वीकरण (Disclaimer): इस ब्लॉग में दी गई जानकारी विभिन्न विश्वसनीय पंचांग स्रोतों और मानक हिंदू कैलेंडर के आधार पर तैयार की गई है। यह जानकारी केवल सामान्य और शैक्षिक उद्देश्य के लिए है। व्रत, पूजा या किसी भी धार्मिक निर्णय से पहले पाठक Drik Panchang, ठाकुर प्रसाद पंचांग या स्थानीय पंडित से तिथि-मुहूर्त की स्वयं जाँच अवश्य करें। क्षेत्र और परंपरा के अनुसार तिथियों व विधियों में अंतर संभव है। किसी भी बदलाव या त्रुटि के लिए हमारा ब्लॉग जिम्मेदार नहीं होगा।

महाशिवरात्रि व्रत में पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQ)

प्रश्न: महाशिवरात्रि व्रत क्यों रखा जाता है?

उत्तर: महाशिवरात्रि भगवान शिव की आराधना का सबसे पावन पर्व है। यह व्रत पापों से मुक्ति, मनोकामना पूर्ति और आत्मिक शुद्धि के लिए रखा जाता है।

प्रश्न: महाशिवरात्रि व्रत कब और किस तिथि को रखा जाता है?

उत्तर: महाशिवरात्रि फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाई जाती है। और इस साल ये त्यौहार 15 फरवरी 2026, दिन रविवार को मनाया जाएगा।

प्रश्न: महाशिवरात्रि व्रत का पारण कब और कैसे करना चाहिए?

उत्तर: व्रत का पारण हमेशा चतुर्दशी तिथि समाप्त होने से पहले और सूर्योदय के बाद करना चाहिए। पारण के समय सात्विक भोजन ही ग्रहण करें और पहले भगवान शिव को भोग लगाएं।

प्रश्न: चारों पहरों की पूजा का क्या महत्व है?

उत्तर: चारों पहरों की पूजा जीवन के चार चरणों और आत्मिक उन्नति का प्रतीक मानी जाती है। प्रत्येक पहर की पूजा विशेष फल प्रदान करती है।

प्रश्न: महाशिवरात्रि की पौराणिक कथा क्या है?

उत्तर: महाशिवरात्रि से जुड़ी कई कथाएँ प्रसिद्ध हैं, जिनमें शिकारी और हिरण की कथा, समुद्र मंथन और शिव-पार्वती विवाह की कथा प्रमुख हैं। लेकिन आज इस ब्लॉग में हमने शिकारी और हिरण की कथा, का विस्तरित वर्णन किया हुआ है।


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