Shattila Ekadashi Vrat Katha In hindi: कभी अन्न का दान न करने वाली ब्राह्मणी की कथा

"अच्छा ज्ञान साझा करना भी एक श्रेष्ठ दान है!"-TipsiLife

Shattila Ekadashi Vrat Katha

हिंदू धर्म में माघ मास का विशेष महत्व है। इस महीने में आने वाली षटतिला एकादशी की कथा न केवल एक धार्मिक कहानी है, बल्कि यह मानव जीवन के लिए एक बहुत बड़ी सीख भी है। अक्सर लोग सोचते हैं कि केवल पूजा-पाठ और उपवास कर लेने से ईश्वर प्रसन्न हो जाते हैं, लेकिन यह कथा बताती है कि ‘दान’ के बिना हर साधना अधूरी है।

आइए, षटतिला एकादशी व्रत कथा (Shattila Ekadashi Vrat Katha in Hindi) के इस ब्लॉग में उस पौराणिक कथा के बारे में विस्तार से जानते हैं, जिसे स्वयं भगवान विष्णु ने नारद मुनि को सुनाया था। यह ऐसी ब्राह्मणी की कथा है, जिसने अपने संपूर्ण जीवन में कभी तिल और अन्न का दान नहीं किया था। इसके बावजूद उसे किस प्रकार वैकुण्ठ धाम की प्राप्ति हुई और मोक्ष का मार्ग कैसे प्रशस्त हुआ—आइए इस पौराणिक कथा के माध्यम से भगवान विष्णु की अद्भुत महिमा को समझते हैं।

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नारद जी की जिज्ञासा

पुराणों में वर्णित एक प्रसंग के अनुसार, एक बार देवर्षि नारद जी के मन में यह प्रश्न उठा कि मृत्युलोक में रहने वाले मनुष्य, जो जाने-अनजाने अनेक पाप कर्म कर बैठते हैं, वे अपने पापों से कैसे मुक्त हो सकते हैं और मोक्ष की प्राप्ति किस प्रकार संभव है। इसी जिज्ञासा के साथ नारद जी भगवान श्री विष्णु के पास पहुँचे और श्रद्धापूर्वक उनसे प्रार्थना की।

नारद जी ने भगवान से पूछा—
“हे प्रभु! कलियुग में मनुष्य अल्पायु, व्यस्त और भ्रमित है। ऐसे में वह कौन-सा व्रत या साधना है, जिसके पालन से वह अपने पापों का नाश कर सकता है? साथ ही कृपया यह भी बताइए कि षटतिला एकादशी व्रत का क्या महत्त्व है और यह व्रत किस प्रकार मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है?”

देवर्षि नारद के प्रश्न को सुनकर भगवान विष्णु प्रसन्न हुए और मंद मुस्कान के साथ बोले—
“हे नारद! मैं तुम्हें एक सत्य एवं पुण्यदायी कथा सुनाता हूँ। यह कथा पृथ्वी लोक की एक ब्राह्मणी की अटूट भक्ति तथा उसके जीवन में हुई एक छोटी-सी भूल से जुड़ी है। इसी कथा के माध्यम से षटतिला एकादशी व्रत का वास्तविक महत्त्व और उसका महान फल प्रकट होगा।”

( कथा आरंभ )

ब्राह्मणी की कठोर तपस्या और अटूट श्रद्धा

प्राचीन काल की बात है। पृथ्वी लोक में एक परम धर्मपरायण ब्राह्मणी निवास करती थी। उसका स्वभाव अत्यंत सात्विक, संयमी और ईश्वर-परायण था। उसके जीवन का एकमात्र उद्देश्य भगवान श्री विष्णु की निष्काम सेवा और भक्ति करना था। वह सांसारिक सुखों से दूर रहकर अपना समस्त समय प्रभु स्मरण में व्यतीत करती थी।

वह नियमपूर्वक प्रत्येक एकादशी का व्रत करती, विधिपूर्वक पूजा-अर्चना करती और कठिन तपस्या में लीन रहती थी। जप, ध्यान और व्रत उसके जीवन का अभिन्न अंग बन चुके थे। वर्षों तक निरंतर व्रत और उपवास करने के कारण उसका शरीर अवश्य दुर्बल हो गया था, किंतु उसकी आत्मा पूर्णतः शुद्ध और पवित्र हो चुकी थी।

उसकी भक्ति इतनी गहन थी कि उसके हृदय में भगवान नारायण के अतिरिक्त और किसी का स्थान नहीं था। तन-मन और कर्म से वह पूर्ण रूप से श्रीहरि को समर्पित हो चुकी थी। उसकी अटूट श्रद्धा और तपस्या से देवता भी प्रसन्न रहते थे और उसका जीवन एक आदर्श भक्त के रूप में जाना जाता था।

भक्ति की कमी: दान का अभाव

भगवान श्री विष्णु ने देवर्षि नारद से कहा—
“हे नारद! इसमें कोई संदेह नहीं कि वह ब्राह्मणी मेरी परम भक्त थी। उसने अपनी इंद्रियों पर पूर्ण नियंत्रण प्राप्त कर लिया था और कठोर व्रत-तप से अपने शरीर को भी साध लिया था। किंतु उसकी भक्ति में एक सूक्ष्म, परंतु महत्वपूर्ण कमी रह गई थी।”

भगवान ने आगे कहा—
“उस ब्राह्मणी ने अपने संपूर्ण जीवन में कभी अन्न दान नहीं किया। उसने न किसी भूखे को भोजन कराया और न ही किसी निर्धन या आवश्यकता-ग्रस्त व्यक्ति की सहायता की।”

शास्त्रों में स्पष्ट कहा गया है कि ‘अन्न दान महादान है’, क्योंकि अन्न से ही प्राणों की रक्षा होती है। ब्राह्मणी ने पूजा-पाठ और उपवास तो अत्यंत निष्ठा से किए, किंतु सेवा और दान के महत्व को वह समझ न सकी। उसे यह भ्रम था कि केवल व्रत और तपस्या से ही समस्त पुण्य और मोक्ष की प्राप्ति हो जाएगी।

दान और करुणा के बिना की गई भक्ति अधूरी रह जाती है—यह सत्य वह ब्राह्मणी जान न सकी। यही कारण था कि उसकी कठोर तपस्या और अटूट श्रद्धा के बावजूद, उसके पुण्य में एक कमी शेष रह गई।

भगवान विष्णु की लीला और भिक्षु रूप

भगवान श्री विष्णु ने देवर्षि नारद से कहा—
“हे नारद! जब मैंने देखा कि उस ब्राह्मणी की भक्ति में दान और करुणा का अभाव है, तब मैंने निश्चय किया कि उसे दान का वास्तविक महत्व समझाया जाए। इसलिए मैं स्वयं उसकी परीक्षा लेने पृथ्वी लोक में गया।”

भगवान विष्णु ने एक अत्यंत दरिद्र भिक्षु का रूप धारण किया। फटे वस्त्र, हाथ में भिक्षा पात्र और मुख पर दीनता का भाव लेकर वे उस ब्राह्मणी के द्वार पर पहुँचे। वहाँ पहुँचकर भिक्षु ने करुण स्वर में पुकारा—
“माई! कुछ भिक्षा दे दो। मैं कई दिनों से भूखा हूँ।”

उस समय ब्राह्मणी अपने व्रत और तपस्या में लीन थी। भिक्षु की पुकार सुनकर वह क्रोधित हो उठी। उसके मन में विचार आया कि यह भिक्षु मेरी साधना में बाधा डालने आ गया है। करुणा के स्थान पर उसके हृदय में अहंकार और क्रोध उत्पन्न हो गया।
अपमान करने के उद्देश्य से उसने अन्न या धन देने के बजाय भूमि से मिट्टी का एक ढेला उठाया और भिक्षु के पात्र में डाल दिया।
यह देखकर भी भगवान विष्णु, जो भिक्षु के वेश में थे, मौन रहे। उन्होंने न कोई प्रतिवाद किया और न ही कोई शब्द कहा। मिट्टी के उस पिंड को लेकर वे शांत भाव से वहाँ से चले गए।

यह भगवान विष्णु की लीला थी, जिसके माध्यम से वे यह दिखाना चाहते थे कि बिना दया और दान के की गई भक्ति अधूरी रह जाती है।

मृत्यु के बाद ब्राह्मणी का बैकुंठ सफर

समय बीतने पर उस ब्राह्मणी ने अपनी कठोर तपस्या और व्रतों के पुण्य प्रभाव से इस लोक का त्याग किया। मृत्यु के पश्चात वह सीधे भगवान श्री विष्णु के परम धाम, अर्थात बैकुंठ लोक पहुँची। वहाँ पहुँचते ही दिव्य वातावरण, अप्सराओं का मधुर गान और देवदूतों द्वारा उसका भव्य स्वागत किया गया।

भगवान की कृपा से उसे निवास हेतु एक अत्यंत सुंदर और दिव्य कुटिया प्रदान की गई। वह कुटिया बाहर से स्वर्ण के समान चमकदार और अत्यंत मनोहर प्रतीत हो रही थी। किंतु जैसे ही ब्राह्मणी ने उसके भीतर प्रवेश किया, वह आश्चर्यचकित रह गई।

कुटिया के भीतर प्रवेश करते ही ब्राह्मणी की दृष्टि वहाँ रखे सभी पात्रों पर पड़ी। भोजन परोसने के लिए सुसज्जित और सुंदर पात्र तो थे, किंतु उनमें अन्न का एक भी दाना नहीं था। उन सभी पात्रों में केवल मिट्टी भरी हुई थी। यहाँ तक कि जल के पात्रों में भी पानी के स्थान पर मिट्टी ही दिखाई दी।

बाहर और भीतर से अत्यंत भव्य दिखाई देने वाली वह कुटिया, बिना अन्न और जल के किसी भी काम की नहीं प्रतीत हो रही थी। वैभव से युक्त होने के बावजूद वह स्थान पूर्णतः निष्प्रयोजन और शून्य सा लग रहा था। यह दृश्य देखकर ब्राह्मणी के मन में गहरी व्याकुलता उत्पन्न हुई और वह अपने कर्मों के रहस्य को समझने का प्रयास करने लगी।

यहीं से उसे यह अनुभव होने लगा कि उसकी तपस्या में कहीं न कहीं कोई ऐसी भूल अवश्य हुई है, जिसके कारण उसे यहाँ यह दुष्फल प्राप्त हो रहा है।

ब्राह्मणी की व्याकुलता और भगवान से प्रश्न

अपने पूर्व कर्मों का फल भोगते हुए वह ब्राह्मणी अत्यंत व्याकुल हो उठी। भूख, प्यास और दरिद्रता से पीड़ित होकर अंततः वह भगवान श्री विष्णु के चरणों में पहुँची। करुणा से भरे नेत्रों और कांपते स्वर में उसने विलाप करते हुए कहा—
“हे प्रभु! मैंने अपने संपूर्ण जीवन में आपकी ही आराधना की है। कठोर व्रत और तपस्या करते-करते मेरा शरीर तक क्षीण हो गया। फिर भी मेरे भाग्य में अन्न का एक दाना भी नहीं है। ऐसे दिव्य कुटिया का मैं क्या करूँ, जहाँ मुझे भूखे पेट सोना पड़े?

ब्राह्मणी के शब्द सुनकर भगवान विष्णु ने शांत और गंभीर स्वर में उत्तर दिया—
“हे देवी! इसमें कोई संदेह नहीं कि तुमने मेरी भक्ति पूरे मन से की है। किंतु जब मैं स्वयं भिक्षु का रूप धारण कर तुम्हारे द्वार पर आया था, तब तुमने मुझे अन्न के स्थान पर मिट्टी का पिंड प्रदान किया था। उसी कर्म के परिणामस्वरूप आज तुम्हें इस सुंदर कुटिया में रखे हुए भोजन के पात्रों में अन्न के स्थान पर मिट्टी प्राप्त हुई है।

भगवान ने आगे कहा—
“तुमने जीवन भर कभी अन्न दान नहीं किया। इसलिए तुम्हारे भाग्य में अन्न का सुख नहीं लिखा गया। भक्ति तभी पूर्ण मानी जाती है, जब उसमें दया, सेवा और दान का समावेश हो।”
यह सुनकर ब्राह्मणी को अपने दोष का बोध हुआ और उसका हृदय पश्चाताप से भर उठा।

षटतिला एकादशी का समाधान

अपनी भूल का बोध होते ही ब्राह्मणी का हृदय ग्लानि से भर उठा। उसने भगवान श्री विष्णु के चरणों में गिरकर विनम्र भाव से क्षमा याचना की और बोली—
“हे प्रभु! मुझसे अज्ञानवश महान अपराध हो गया है। कृपया मुझे ऐसा उपाय बताइए, जिससे मेरे दोषों का नाश हो और मेरी भक्ति पूर्ण हो सके।”

ब्राह्मणी की प्रार्थना सुनकर भगवान विष्णु ने करुणापूर्वक कहा—
“हे देवी! शीघ्र ही देव लोक की देव-स्त्रियाँ तुमसे मिलने आएँगी। उस समय तुम अपनी कुटिया का द्वार तुरंत मत खोलना। उनसे कहना कि पहले वे तुम्हें षटतिला एकादशी व्रत का विधान और उसके पुण्य फल का विस्तार से वर्णन करें। जब वे तुम्हें इस व्रत का रहस्य समझा दें, तभी द्वार खोलना।”

भगवान की आज्ञा का पालन करते हुए ब्राह्मणी ने वैसा ही किया। जब देव-स्त्रियाँ वहाँ पहुँचीं, तो उन्होंने उसे माघ मास की इस विशेष एकादशी का महत्व समझाया। उन्होंने बताया कि इस दिन तिल के छह प्रकार से उपयोग और दान करने का विधान है—
तिल से स्नान, तिल का उबटन, तिल का हवन, तिल का भोजन, तिल का दान और तिल का सेवन।

देव-स्त्रियों ने कहा कि षटतिला एकादशी का व्रत और विधिपूर्वक तिल दान करने से मनुष्य के संचित पाप नष्ट होते हैं, दरिद्रता दूर होती है और अंततः मोक्ष की प्राप्ति होती है।
यह दिव्य उपदेश सुनकर ब्राह्मणी का जीवन धन्य हो गया और उसने निश्चय किया कि वह आगे से भक्ति के साथ-साथ दान और सेवा का भी पालन करेगी।

व्रत का प्रभाव और ब्राह्मणी का कायाकल्प

देव-स्त्रियों से षटतिला एकादशी व्रत का विधान सुनकर ब्राह्मणी ने पूर्ण श्रद्धा और नियमपूर्वक इस व्रत का पालन किया। माघ मास की एकादशी के दिन उसने तिल से स्नान किया, तिल का उबटन लगाया, भगवान श्री विष्णु की पूजा में तिल अर्पित किए और विधिपूर्वक तिल का दान किया।

इस पुण्य व्रत के प्रभाव से शीघ्र ही एक अद्भुत परिवर्तन देखने को मिला। जो कुटिया पहले सूनी और निर्धनता का प्रतीक थी, वह देखते ही देखते धन, धान्य, स्वर्ण और सभी सुख-सुविधाओं से परिपूर्ण हो गई। ब्राह्मणी की दरिद्रता दूर हो गई और उसके जीवन में पुनः समृद्धि का प्रवेश हुआ।

केवल बाहरी वैभव ही नहीं, बल्कि उसका रूप और तेज भी दिव्य हो गया। उसका शरीर स्वस्थ, मन शांत और हृदय करुणा से भर गया। उसे यह सत्य भली-भांति समझ में आ गया कि केवल व्रत और उपवास ही पर्याप्त नहीं होते, बल्कि दान, सेवा और परोपकार के बिना भक्ति अधूरी रह जाती है।

इस प्रकार षटतिला एकादशी व्रत ने न केवल उसके जीवन की दशा बदली, बल्कि उसे मोक्ष मार्ग की सच्ची दिशा भी प्रदान की।

( कथा समाप्त )

षटतिला एकादशी की सीख: दान क्यों जरूरी है?

षटतिला एकादशी की यह पौराणिक कथा हमें एक गहरी और जीवनोपयोगी सीख देती है। यह कथा स्पष्ट करती है कि केवल पूजा-पाठ, व्रत और उपवास से ही भक्ति पूर्ण नहीं होती। जब तक मनुष्य के हृदय में करुणा, सेवा और दान की भावना नहीं होती, तब तक उसकी साधना अधूरी ही मानी जाती है।

ब्राह्मणी की कथा यह सिखाती है कि ईश्वर भक्ति के साथ-साथ समाज के प्रति उत्तरदायित्व निभाना भी आवश्यक है। भूखे को भोजन कराना, जरूरतमंद की सहायता करना और अन्न दान करना सबसे श्रेष्ठ पुण्य कर्मों में से एक है। इसी कारण शास्त्रों में कहा गया है— “अन्न दान महादान है।”

षटतिला एकादशी के दिन तिल के छह प्रकार के उपयोग का विधान बताया गया है, जो मनुष्य को मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक रूप से शुद्ध करता है—
तिल स्नान – शरीर और मन की शुद्धि के लिए
तिल का उबटन – नकारात्मकता और दोषों के नाश हेतु
तिल का हवन – वातावरण की पवित्रता और पुण्य वृद्धि के लिए
तिल का तर्पण – पितृ संतोष और ऋण मुक्ति हेतु
तिल का भोजन – स्वास्थ्य और सात्विकता के लिए
तिल का दान – दरिद्रता नाश और पुण्य प्राप्ति के लिए

इस प्रकार षटतिला एकादशी हमें यह संदेश देती है कि भक्ति तभी फलदायी होती है, जब उसमें दया, दान और परोपकार का समावेश हो। यही इस व्रत का वास्तविक सार और आध्यात्मिक महत्व है।

मोक्ष का मार्ग

षटतिला एकादशी की यह पावन कथा हमें हर वर्ष यह स्मरण कराती है कि मनुष्य को अपने सामर्थ्य के अनुसार दान और पुण्य कर्म अवश्य करते रहना चाहिए। केवल व्रत, उपवास और पूजा से ही जीवन सफल नहीं होता, बल्कि दया, करुणा और परोपकार से ही भक्ति पूर्णता को प्राप्त होती है।

माघ मास में षटतिला एकादशी के दिन तिल का दान करने से न केवल पापों का नाश होता है, बल्कि शनि दोष, दरिद्रता और जीवन के अनेक कष्ट भी दूर होते हैं। इस व्रत के माध्यम से भगवान श्री विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है और साधक के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है।

शास्त्रों में वर्णित है कि जो श्रद्धालु इस पवित्र कथा को श्रद्धापूर्वक पढ़ता या सुनता है, उसे अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य फल प्राप्त होता है। अंततः ऐसा भक्त समस्त सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर भगवान विष्णु के परम धाम, विष्णु लोक, को प्राप्त करता है।

यही षटतिला एकादशी का वास्तविक संदेश है—
दान के साथ भक्ति, और करुणा के साथ साधना ही मोक्ष का सच्चा मार्ग है। 🙏
इस माघ मास में, आइए हम भी संकल्प लें कि हम न केवल उपवास रखेंगे, बल्कि किसी जरूरतमंद की मदद करके अपने जीवन में वास्तविक ‘पुण्य’ का संचार करेंगे। श्री हरि विष्णु आपकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करें। ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥🙏

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व्रत, पूजा या किसी भी धार्मिक निर्णय में इस जानकारी का उपयोग करने से पूर्व कृपया अपने स्थानीय मंदिर, विद्वान पंडित या संबंधित विशेषज्ञ से अवश्य परामर्श करें। क्षेत्र, स्थान और स्थानीय परंपराओं के अनुसार तिथियों व विधियों में अंतर संभव है। कैलेंडर में होने वाले किसी भी परिवर्तन, भिन्नता या त्रुटि के लिए हम उत्तरदायी नहीं होंगे।

❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

प्रश्न 1: षटतिला एकादशी की कथा में ब्राह्मणी को बैकुंठ की दिव्य कुटिया में भोजन का प्रबंध क्यू नहीं था?

उत्तर: ब्राह्मणी ने जीवन भर कठोर व्रत और तपस्या तो की, लेकिन उसने कभी किसी भूखे या जरूरतमंद को अन्न दान नहीं दिया। यहाँ तक कि जब भगवान विष्णु स्वयं भिक्षु बनकर उसके द्वार आए, तब भी उसने उन्हें भोजन के स्थान पर मिट्टी का पिंड दे दिया। इसी दान के अभाव के फलस्वरूप उसे बैकुंठ की दिव्य कुटिया में भोजन का प्रबंध नहीं था।

प्रश्न 2: ब्राह्मणी ने भिक्षु रूप में आए भगवान विष्णु को क्या भिक्षा दी थी?

उत्तर: अहंकार और क्रोध के कारण ब्राह्मणी ने भिक्षा पात्र में अन्न के बजाय मिट्टी का एक ढेला डाल दिया था। यही उसकी सबसे बड़ी भूल थी, जिसके कारण उसे अपने कर्मों का फल भोगना पड़ा।

प्रश्न 3: षटतिला एकादशी का व्रत करने से ब्राह्मणी को क्या फल प्राप्त हुआ?

उत्तर: षटतिला एकादशी व्रत के प्रभाव से ब्राह्मणी की कुटिया भोजन और सुख-सुविधाओं से भर गई। साथ ही उसके सभी दोष दूर हुए और अंत में उसे भगवान विष्णु की कृपा से मोक्ष की प्राप्ति हुई।

प्रश्न 4: ब्राह्मणी को षटतिला एकादशी व्रत की विधि किसने बताई थी?

उत्तर: भगवान विष्णु के निर्देश पर ब्राह्मणी ने देव लोक की देव-स्त्रियों के आगमन की प्रतीक्षा की। उन्हीं देव-स्त्रियों ने उसे षटतिला एकादशी व्रत का महत्व और सही विधि विस्तार से समझाई।

प्रश्न 5: षटतिला एकादशी की कथा पढ़ने या सुनने का क्या पुण्य फल माना गया है?

उत्तर: मान्यताओं के अनुसार, जो व्यक्ति श्रद्धा से इस कथा को पढ़ता या सुनता है, उसे अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य प्राप्त होता है। यह कथा हमें सिखाती है कि केवल भक्ति ही नहीं, बल्कि दान और परोपकार भी मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करते हैं।


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