Jaya Ekadashi Vrat Katha 2026 In Hindi: जानें माल्यवान और पुष्पवती को दोषो से कैसे मिली मुक्ति? व्रत का रहस्य

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Jaya Ekadashi Vrat Katha 2026 In Hindi

हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व है, लेकिन माघ मास के शुक्ल पक्ष की जया एकादशी (Jaya Ekadashi 2026) को बहुत ही कल्याणकारी और पुण्यदायी माना जाता है। जया का अर्थ होता है विजय, इसलिए यह एकादशी जीवन में सफलता, पापों से मुक्ति और आत्मिक शुद्धि प्रदान करने वाली मानी जाती है।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जो भक्त श्रद्धा और विधि-विधान से जया एकादशी व्रत करता है और इस दिन जया एकादशी व्रत कथा 2026 का श्रवण करता है, उसे प्रेत योनि, पिशाच योनि जैसे भयावह कष्टों से मुक्ति प्राप्त होती है। यह व्रत मनुष्य के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और मानसिक शांति भी प्रदान करता है।

🔔 नोट:
इस लेख के अगले भाग में श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए हम Jaya Ekadashi Vrat Katha 2026 In Hindi विस्तार से प्रस्तुत कर रहे हैं, ताकि आप व्रत के दौरान इस पावन पौराणिक व्रत कथा (माल्यवान और पुष्पवती वाली कथा) का पाठ कर सकें। जिसमे जानेंगे कैसे इंद्रसभा के गंधर्व माल्यवान को श्राप से मुक्ति प्राप्त हुई थी। लेकिन उससे पहले हम अपने पाठको को इस साल जया एकादशी 2026 व्रत की सही तिथि और व्रत पारण समय बता देते है।

जया एकादशी 2026: तिथि और व्रत पारण समय

साल 2026 में जया एकादशी व्रत निम्न तिथि और समय पर मनाया जाएगा:

जया एकादशी तिथि: 29 जनवरी 2026, गुरुवार
एकादशी तिथि प्रारंभ: 28 जनवरी 2026, शाम 04:35 pm बजे से
एकादशी तिथि समाप्त: 29 जनवरी 2026, दोपहर 01:55 pm बजे तक
व्रत पारण समय: 30 जनवरी 2026, सुबह 07:10 am – सुबह 09:20 बजे तक

👉 शास्त्रों के अनुसार, व्रत का पारण द्वादशी तिथि में निर्धारित शुभ समय पर ही करना चाहिए।

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👉 Jaya Ekadashi 2026 Kab Hai? 28 या 29 जनवरी – व्रत तिथि, पूजा विधि, नियम, व्रत पारण समय Free PDF और दोष निवारण उपाय

जया एकादशी 2026 व्रत कथा (Jaya Ekadashi Vrat Katha 2026)

(कथा आरंभ)

श्रीकृष्ण और युधिष्ठिर का संवाद

कथा की शुरुआत द्वापर युग के एक प्रसंग से होती है। जब धर्मराज युधिष्ठिर ने अत्यंत विनम्र होकर भगवान श्रीकृष्ण से पूछा— “हे जनार्दन! आपने माघ मास के कृष्ण पक्ष की षटतिला एकादशी का महत्त्व  बताकर मुझ पर बड़ी कृपा की। अब कृपा करके माघ शुक्ल पक्ष की एकादशी के बारे में बताएं। इस एकादशी का नाम क्या है, इसकी विधि क्या है और इसके करने से किस फल की प्राप्ति होती है?”

भगवान श्रीकृष्ण ने मंद मुस्कान के साथ उत्तर दिया— “हे कुंतीपुत्र! माघ शुक्ल पक्ष की एकादशी को जया एकादशी कहा जाता है। यह एकादशी अत्यंत पुण्यदायी है। जो मनुष्य इस व्रत को रखता है, उसे ब्रह्महत्या जैसे जघन्य पापों से भी मुक्ति मिल जाती है। इसके प्रभाव से भूत, प्रेत और पिशाच जैसी नीच योनियों का भय सदा के लिए समाप्त हो जाता है। इसी संदर्भ में मैं तुम्हें एक प्राचीन कथा सुनाता हूँ, जिसे ध्यानपूर्वक सुनो।”

स्वर्ग का नंदन वन और उत्सव का वातावरण

प्राचीन काल में स्वर्गलोक में देवराज इंद्र का शासन था। वहां का वातावरण सदैव दिव्य संगीत और नृत्य से गुंजायमान रहता था। एक समय इंद्र अपनी सभा के साथ नंदन वन में विहार कर रहे थे। नंदन वन अपनी सुंदरता के लिए तीनों लोकों में प्रसिद्ध था— वहां के वृक्ष कल्पवृक्ष के समान फल देने वाले थे और वायु सदैव सुगंधित रहती थी।

उस दिन वहां एक भव्य उत्सव का आयोजन था। देवताओं के मनोरंजन के लिए गंधर्व गा रहे थे और अप्सराएं नृत्य कर रही थीं। उस सभा में माल्यवान नाम का एक गंधर्व था, जिसका कंठ इतना मधुर था कि उसकी गायकी सुनकर देवता भी मंत्रमुग्ध हो जाते थे। वहीं सभा में पुष्पवती नाम की एक अप्सरा भी नृत्य कर रही थी, जिसका सौंदर्य अद्वितीय था।

मोह का बंधन और मर्यादा का उल्लंघन

जैसे ही पुष्पवती ने नृत्य करना प्रारंभ किया, उसकी दृष्टि माल्यवान पर पड़ी। माल्यवान के आकर्षक रूप को देखकर पुष्पवती उस पर मोहित हो गई। कामदेव के वश में होकर पुष्पवती ने अपनी कला का उपयोग माल्यवान को रिझाने के लिए करना शुरू कर दिया। वह अपनी चंचल चितवन और कामुक मुद्राओं से माल्यवान को भ्रमित करने लगी।

माल्यवान भी पुष्पवती के सौंदर्य के जाल में फंस गया। वह यह भूल गया कि वह देवराज इंद्र की सभा में है और एक पवित्र उत्सव का हिस्सा है। मोहवश माल्यवान का मन भटक गया। उसका ध्यान संगीत की लय (ताल) और सुरों से हट गया। वह बेसुरा गाने लगा और गायन की शुद्धता समाप्त हो गई। सभा में उपस्थित देवता और ऋषि चकित रह गए कि इतना बड़ा गंधर्व ऐसी त्रुटि कैसे कर सकता है।

देवराज इंद्र का क्रोध और श्राप

देवराज इंद्र, जो सभा के अनुशासन और मर्यादा के रक्षक थे, तुरंत समझ गए कि माल्यवान और पुष्पवती एक-दूसरे के मोह में पड़कर सभा की गरिमा को भंग कर रहे हैं। इंद्र को बहुत क्रोध आया। उन्होंने इसे अपना और पूरी देव-सभा का अपमान माना।

इंद्र ने गरजते हुए कहा— “हे माल्यवान! हे पुष्पवती! तुम दोनों ने कामवासना के वशीभूत होकर स्वर्ग की पवित्र सभा में अपनी कला को कलंकित किया है। तुमने गुरुओं और देवताओं की उपस्थिति की मर्यादा का उल्लंघन किया है। अतः मैं तुम्हें श्राप देता हूँ कि तुम अभी इसी क्षण स्वर्गलोकसे गिरकर मृत्युलोक (पृथ्वी) पर जाओ। तुम दोनों को स्त्री-पुरुष के रूप में नहीं, बल्कि अत्यंत घृणित और वीभत्स पिशाच योनि प्राप्त होगी। तुम वहां अपने किए का फल भोगोगे।”

पिशाच योनि का भीषण कष्ट

इंद्र के श्राप देते ही माल्यवान और पुष्पवती स्वर्ग से नीचे गिर गए और हिमालय के दुर्गम क्षेत्रों में पिशाच के रूप में प्रकट हुए। उनका दिव्य रूप अब भयानक और डरावना हो चुका था। उनके शरीर से दुर्गंध आती थी, बाल जटाओं जैसे हो गए थे और उनकी वाणी कड़वी हो गई थी।

हिमालय की उस भीषण ठंड में उन्हें रहने के लिए कोई स्थान नहीं था। पिशाच योनि में उन्हें न तो भूख लगती थी जिससे वे तृप्त हो सकें, न ही प्यास बुझती थी। वे दिन-भर भोजन की तलाश में भटकते, लेकिन उन्हें कुछ प्राप्त नहीं होता। रात की ठंड इतनी असहनीय होती कि वे सो भी नहीं पाते थे। वे एक-दूसरे को देखकर रोते और पछताते कि एक पल के मोह ने उन्हें स्वर्ग के सुखों से नरक के समान कष्टों में धकेल दिया है। उन्होंने कई वर्ष इसी कष्ट में बिताए।

अनजाने में हुआ जया एकादशी का चमत्कार

समय बीतता गया और माघ मास आया। माघ शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि (जया एकादशी) के दिन नियति ने एक करवट ली। उस दिन हिमालय पर बहुत अधिक बर्फबारी हो रही थी। माल्यवान और पुष्पवती अत्यंत दुर्बल हो चुके थे। दुख और पीड़ा के कारण उस दिन उन्होंने एक दाना भी ग्रहण नहीं किया।

उन्होंने केवल पीपल के वृक्ष के नीचे बैठकर अपना समय बिताया। भूख और प्यास के कारण उन्हें भोजन की सुध नहीं रही, और ठंड के मारे वे सो भी नहीं पाए। इस प्रकार अनजाने में ही उनका ‘उपवास’ और ‘रात्रि जागरण’ संपन्न हो गया। उन्होंने मन ही मन भगवान नारायण को याद किया और कहा— “हे प्रभु! हमने न जाने पिछले जन्मों में क्या पाप किए थे जो हमें यह योनि मिली। हमें क्षमा करें, यह कहकर दोनों विष्णु नाम गायन करने लगे।”

भगवान विष्णु, जो हृदय की पुकार सुनते हैं, उनके इस अनजाने में किए गए कठिन व्रत से अत्यंत प्रसन्न हुए।

श्राप से मुक्ति और दिव्य पुनर्जन्म

जैसे ही अगले दिन (द्वादशी) का सूर्योदय हुआ, एक चमत्कार घटित हुआ। माल्यवान और पुष्पवती की पिशाच देह त्याग दी गई और वे पुनः अपने पुराने दिव्य और सुंदर स्वरूप में आ गए। आकाश से पुष्प वर्षा होने लगी और देवताओं के विमान उन्हें लेने आए।

वे दोनों चकित थे कि बिना किसी विशेष अनुष्ठान के उन्हें मुक्ति कैसे मिली। तब आकाशवाणी हुई— “हे गंधर्व और अप्सरा! तुमने माघ शुक्ल एकादशी का निर्जला व्रत और रात्रि जागरण किया है। यह जया एकादशी का ही पुण्य प्रताप है कि तुम पिशाच योनि से मुक्त होकर पुनः स्वर्ग के अधिकारी बने हो।”

स्वर्ग वापसी और इंद्र का विस्मय

जब माल्यवान और पुष्पवती पुनः इंद्र की सभा में पहुंचे, तो देवराज इंद्र उन्हें देखकर दंग रह गए। उन्होंने पूछा— “तुम दोनों तो श्राप के कारण पिशाच बन गए थे, फिर इतनी जल्दी मुक्त कैसे हुए? तुम्हें किसने जीवनदान दिया?”

माल्यवान ने हाथ जोड़कर कहा— “हे स्वामी! यह भगवान विष्णु की ‘जया एकादशी’ का प्रभाव है। हमने अनजाने में इस व्रत का पालन किया और भगवान माधव की कृपा से हमें यह नया जीवन मिला है।” यह सुनकर इंद्र बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने कहा— “जो भगवान विष्णु के भक्त हैं, वे मेरे लिए भी वंदनीय हैं। अब आप निर्भय होकर स्वर्ग में निवास करें।”

भगवान श्रीकृष्ण ने कथा समाप्त करते हुए युधिष्ठिर से कहा— “हे राजन्! यह जया एकादशी का महत्त्व है। जो व्यक्ति इस कथा को पढ़ता या सुनता है, उसे अग्निष्टोम यज्ञ का फल मिलता है। यह व्रत मनुष्य को नीच योनियों के भय से मुक्त कर मोक्ष प्रदान करने वाला है।”

( व्रत कथा समाप्त )

जया एकादशी 2026 व्रत कथा: आध्यात्मिक और धार्मिक महत्व

जया एकादशी का व्रत न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि इसका आध्यात्मिक महत्व भी गहरा है। यह व्रत हमें संयम, अनुशासन और ईश्वर के प्रति अटूट श्रद्धा रखना सिखाता है। माघ मास के शुक्ल पक्ष की यह तिथि हमें याद दिलाती है कि भगवान की शरण में जाने से बड़े से बड़े पाप और कष्ट (जैसे माल्यवान को पिशाच योनि से मुक्ति मिली) दूर हो सकते हैं।

यदि आप इस वर्ष सुख, समृद्धि और मानसिक शांति की कामना रखते हैं, तो विधि-विधान से व्रत रखें और श्रद्धापूर्वक Jaya Ekadashi Vrat Katha 2026 का पाठ करें। भगवान विष्णु की कृपा आप और आपके परिवार पर सदैव बनी रहे।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय!

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❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

प्रश्न: jaya ekadashi vart katha 2026 in Hindi कहाँ पढ़ सकते हैं?

उत्तर: आप Jaya ekadashi vart katha 2026 in Hindi इसी लेख में विस्तार से पढ़ सकते हैं, जहाँ माल्यवान को दोषों से मुक्ति कैसे मिली, उसकी पूरी पौराणिक कथा सरल भाषा में बताई गई है।

प्रश्न: जया एकादशी व्रत कथा पढ़ने से क्या लाभ मिलता है?

उत्तर: जया एकादशी व्रत कथा पढ़ने या सुनने से व्यक्ति के पापों का नाश होता है, नकारात्मक दोष दूर होते हैं और जीवन में सुख, शांति व सफलता प्राप्त होती है।

प्रश्न: माल्यवान को किस दोष से मुक्ति मिली थी?

उत्तर: पौराणिक कथा के अनुसार गंधर्व माल्यवान को श्राप के कारण पिशाच योनि प्राप्त हुई थी, लेकिन जया एकादशी व्रत के प्रभाव से उसे उस दोष से मुक्ति मिल गई।

प्रश्न: जया एकादशी के दिन कौन सी व्रत कथा पढ़नी चाहिए?

उत्तर: जया एकादशी के दिन जया एकादशी व्रत कथा (माल्यवान और पुष्पवती की कथा) का पाठ करना सबसे श्रेष्ठ माना जाता है। इस कथा में बताया गया है कि किस प्रकार इंद्रसभा के गंधर्व माल्यवान को श्राप के कारण पिशाच योनि प्राप्त हुई थी और भगवान विष्णु की कृपा से जया एकादशी व्रत करने पर उसे दोषों से मुक्ति मिली। इस कथा का पाठ करने से पापों का नाश होता है, नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और जीवन में सुख-समृद्धि प्राप्त होती है।

प्रश्न: जया एकादशी 2026 में कब है?

उत्तर: साल 2026 में जया एकादशी का व्रत 29 जनवरी, गुरुवार को रखा जाएगा। एकादशी तिथि 28 जनवरी की शाम 04:35 pm बजे से शुरू होकर दोपहर 01:55 pm बजे तक रहेगी।


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